काल्पनिक जोधाबाई का वास्तविक सत्य

वैसे तो वामपंथियों, मुस्लिम, अंग्रेज, कांग्रेसी इतिहासकारों ने हिन्दु इतिहास को कलंकित करने तथा मिटाने में कोई कसर नही छोडी और इतना ही नही उन्होंने मनगढंत कई काल्पनिक पात्र तक बना डाले।क्योंकि आमने-सामने न तो उनके पुरखे अपने स्वप्न पूरे कर सके न ही ये।

और इन्हीं पात्रो को हमारे ही समाज के दलाल अपने फायदे के लिए खूब भुनाते है।इसी प्रकार का एक कल्पना पर आधारित मनगढंत पात्र है “जोधाबाई”जिसका इतिहास मे कोई प्रमाण नही, इसका वास्तविक सत्य हम आपको बताते है।

मुगल-राजपूत वैवाहिक सम्ब्न्द्धो का बार-बार जो जिक्र करते है उन्होंने कभी इतिहास तो क्या कक्षा 9 अथवा 10 की इतिहास की पुस्तक नही पढी होगी।कृपया इसे अधिक से अधिक शेयर करे ताकि अधिक लोग जागरूक हो।

1 – अकबरनामा (Akbarnama) में जोधा का कहीं कोई उल्लेख या प्रचलन नही है।।इस पुस्तक मे अकबर के बारे मे एक एक बात प्रमाणित दी गई है।उसके प्रत्येक सगे-सम्बन्धी इत्यादि के बारे मे, अगर कोई बात इस पुस्तक से मेल नही खाती तो इतिहासकार उसे अधिक तवज्जो नही देते है।और इस पूरी पुस्तक मे हुकुम “जोधा” शब्द का उल्लेख नही है जोधा तो दूर अकबर की किसी हिन्दु रानी का उल्लेख नही है।

2- तुजुक-ए-जहांगिरी-(जहांगीर की आत्मकथा /BIOGRAPHY of Jahangir) में भी जोधा का कहीं कोई उल्लेख नही है। जब की एतिहासिक दावे और झूठे सीरियल यह कहते हैं की जोधा बाई अकबर की पत्नी व जहांगीर की माँ थी जब की हकीकत यह है की “जोधा बाई” का पूरे इतिहास में कहीं कोई नाम नहीं है, जोधा का असली नाम {मरियम- उल-जमानी}( Mariam uz-Zamani ) था जो कि आमेर के राजा भारमल के विवाह के दहेज में आई परसीयन दासी की पुत्री थी उसका लालन पालन राजपूताना में हुआ था इसलिए वह राजपूती रीती रिवाजों को भली भाँती जानती थी तथा राजपूतो मे रहने के कारण शस्त्र विद्या मे भी निपुण थीऔर राजपूतों में उसे हीरा कुँवरनी (हरका) कहते थे, यह राजा भारमल की कूटनीतिक चाल थी, राजा भारमल एक चतुर राजा थे जो तलवार के साथ-साथ अपनी बुद्धि का बखूबी उपयोग करते थे।वे जानते थे की अकबर की सेना संख्या में उनकी सेना से बड़ी है क्योंकि उनकी तरफ से हर एक इस्लामिक व्यक्ति लडता था जो कि लाखों मे सँख्या पहुँचती और आर्यों मे लडने का कार्य सिर्फ”क्षत्रियो” का था। अतः युद्व विदेशियों की भारी-भरकम सेना तथा राजपूत टुकडियों मे होता था, फिर भी विजयश्री हमेशा राजपूतो का वरण करती।

राजा भारमल वृद्ध भी थे उन्हें पता था कि अगर युद्व होता है तो राजपूतो को तो इन्तजार ही रहता था रणशौर्य दिखलाने का परंतु वहाँ की सारी प्रजा जो शस्त्र चलाना तो दूर देखे तक नही थे उनका क्या होगा। वहीं दूसरी तरफ वे मुगलो की बर्बरता से अच्छी तरह वाकिफ थे।इसलिए राजा भारमल ने हवसी अकबर को बेवकूफ बनाकर उससे सन्धि करना ठीक समझा , इससे पूर्व में अकबर ने एक बार राजा भारमल की पुत्री से विवाह करने का प्रस्ताव रखा था जिस पर भारमल ने कड़े शब्दों में क्रोधित होकर प्रस्ताव ठुकरा दिया था , परंतु बाद में राजा के दिमाग में युक्ती सूझी , उन्होने अकबर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और परसियन दासी को हरका बाई बनाकर उसका विवाह रचा दिया , क्योकी राजा भारमल ने उसका कन्यादान किया था इसलिये वह राजा भारमल की धर्म पुत्री थी लेकिन वह कछ्वाहा क्षत्रिय राजकुमारी नही थी ।। उन्होंने यह प्रस्ताव को एक AGREEMENT की तरह या राजपूती भाषा में कहें तो हल्दी-चन्दन किया था ।।

3- अरब में “बहुत सी किताबों” में लिखा है हम यकीन नहीं करते इस निकाह पर हमें संदेह है ।।

4- ईरान के मल्लिक नेशनल संग्रहालय एन्ड लाइब्रेरी में रखी किताबों में इन्डियन मुगलों का विवाह एक परसियन दासी से करवाए जाने की बात लिखी है ।।

5- अकबर-ए-महुरियत में यह साफ-साफ लिखा है कि (we dont have trust in this Rajput marriage because at the time of mariage there was not even a single tear in any one’s eye even then the Hindu’s God Bharai Rasam was also not Happened ) “हमें इस हिन्दू निकाह पर संदेह है क्यौकी निकाह के वक्त राजभवन में किसी की आखों में आँसू नही थे सभी प्रसन्न थे जैसे कि कोई जंग जीती हो। और ना ही हिन्दू गोद भराई की रस्म हुई थी ।। क्योंकि विश्व मे सबसे अधिक त्यौहार व रस्मों रिवाज राजपूतो मे बडी शानोशौकत से होते है।

6- उस वक्त महाराजा भारमल के समकालीन सिक्ख धर्म के गुरू अर्जुन और गुरू गोविन्द सिंह ने इस विवाह के समय यह बात स्वीकारी थी कि (written in Punjabi font – “ਰਾਜਪੁਤਾਨਾ ਆਬ ਤਲਵਾਰੋ ਓਰ ਦਿਮਾਗ ਦੋਨੋ ਸੇ ਕਾਮ ਲੇਨੇ ਲਾਗਹ ਗਯਾ ਹੈ “ ) कि क्षत्रियो , ने अब तलवारों और बुद्धी दोनो का इस्तेमाल करना सीख लिया है , मतलब राजपुताना अब तलवारों के साथ-साथ बुद्धि का भी काम लेने लगा है ।। ( At the time of this fake mariage the Guru of Sikh Religion ” Arjun Dev and Guru Govind Singh” also admited that now Kshatriya Rajputs have learned to use the swords with brain also !! )

7- 17वी सदी में जब पारसीभारत भ्रमण के लिये आये तब उन्होंने अपनी रचना (Book) ” परसी तित्ता/PersiTitta ” में यह लिखा है की “यहाँ एक भारतीय महाराजा एक परसियन वैश्या को शाही हरम में भेज रहा है , अत: हमारे देव (अहुरा मझदा) इस राजा को स्वर्ग दें ( In 17 th centuary when the Persian came to India So they wrote in there book (Persi Titta)that ” This Indian King is sending a Persian prostitude to her right And deservable place and May our God (Ahura Mazda) give Heaven to this Indian King.

8- हमारे इतिहास में राव और भट्ट होते हैं , जो हमारा इतिहास लिखते हैं !! उन्होंने साफ साफ लिखा है की ”गढ़ आमेर आयी तुरकान फौज,
ले ग्याली पसवान कुमारी, राण राज्या राजपूता लेली इतिहासा पहली बार ले बिन लड़िया जीत (1563 AD )।”मतलब आमेर किले में मुगल फौज आती है और एक दासी की पुत्री को ब्याह कर ले जाती है, “”हे रण के लिये पैदा हुए राजपूतों तुमने सदा रण करके विजय प्राप्त की परंतु आज इतिहास में ले ली बिना लड़े पहली जीत।”” 1563 AD

9-यह वो समय था जब विदेशी बर्बरो के आक्रमण तेज हो रहे थे और वो तथाकथित “अकबर महान” था जिसके समय मे लाखों हिन्दु स्त्रियां पति के मरणोपरांत जोहर की धधकती आग में कूद ( अगनी कुन्ड में )कूद जाती थी ताकी मुगल सेना उन्हे छूना तो दूर देख भी ना सके , क्या उनका बलिदान व्यर्थ हे जो हम उस जलालउद्दीन मुहम्मद अकबर को अकबर महान कहते हे सिर्फ महसूर कर माफ कर देने के कारण भारतीय व्यापारियों ने उसे अकबर महान का दर्जा दिया !!अब ये बात बताईये कि क्या “हिन्दूस्तान में हिन्दूओं” पर तीर्थ यात्रा पर से कोई टेक्स हटा देना कौन सी बड़ी महानता है , यह तो वैसे भी हमारा हक था और बेवकूफ ने एक कायर को अकबर महान का दर्जा दे दिया। (हिन्दूस्तान पर राज करने के लिये अकबर ने अपने दरबार में नौ लोगों को नवरत्न बनाया जिसमे 4 हिन्दू थे । राजा मान सिंह जिन्होंने वास्तविकता मे मुगलो का शोषण किया जजिया कर माफ करवाया जो कि अकबर के समकालीन थे और अकबर के नवरत्नो में से एक थे उन्होंने अकबर से हिन्दूओं पर से तीर्थ यात्रा(महसूर)कर माफ करने की मांग उठाई सत्ता के लालची अकबर को डर था क्यौ कि उसके 4 रत्न हिन्दू थे और अगर वह मान सिंह की मांग को खारिज कर देता तो बाकी के हिन्दू रत्न उसके लिये काम छोड़ सक्ते थे क्यों की अकबर की झूठी सेक्यूलर छवि का असली चहरा सामने आ जाता (और सच्चाई भी यही थी की वह एक कट्टरवादी और डरपोक(फट्टू) किस्म का शासक था उसको यह बात पता थी कि हिन्द पर कट्टर छवि कि बदोलत राज नही किया जा सकता यही वजह थी की उसके पूर्वज हिन्द पर राज ना कर सके थे इस बात को समझते हुए अकबर ने हिन्दू राजाओं में फूट डालने का राजनितिक तरीका अपनाया ) और उसका हिन्दुस्तान पर शासन का सपना अधूरा रह सकता था इस बात के भय से उसने तीर्थ यात्रा कर(टेक्स) हटा दिया, और हमारे ही हिन्दु, राजा मानसिंह को अपशब्द कहकर अकबर को अपना बाप समझते है।।।यह वो समय था जब राणा प्रताप, राणा उदय सिंह,दुर्गा दास, जयमल और फत्ता(फतेह सिंह) जैसे वीर सपूत हुए , यह वही समय था जब महारानी दुर्गावती, महारानी भानूमती, महारानी रूप मती जैसी वीर राजपूतानी क्षत्राणियों ने अकबर से न सिर्फ युद्घ किये बल्कि उसे प्रत्येक युद्व मे बुरी तरह पराजित भी किया!!हिन्दुओ मे शायद ही कोई-कोई इन नामो को जानता होगा।

10- मुगलों ने जब चित्तौड़ किले पर आक्रमण किया तब मात्र 5,000 से 10,000 राजपूत किले पर मैजूद थे जिन से अकबर ने 50,000 से 80,000 मुगलों को लड़वाया , मतलब साफ है की अकबर राजपुताना से बराबरी से लड़ने की दम नहीं रखता था , इस युद्ध में जयमल सिंह राठौढ़ मेड़तिया और फतेह सिंह सिसौदिया ने अकबर के दांत खट्टे कर दिये थे । उस युद्ध में अकबर की आधी से ज्यादा सेना को राजपूतों ने मौत के घाट उतार दिया था और भारी मात्रा में नुकसान पहुंचाया था। अपनी इस नुकसान को देखकर तथा पराजय से खिसयाए अकबर ने चित्तौड़ के लगभग 25,000 गैर इस्लामिक परिवारों(हिन्दुओ) को मौत के घाट उतरवा दिया था (क्योंकि चित्तौड़ के सभी राजपूत जंग मे व्यस्त थे अथवा अपना बलिदान दे चुके थे और जो बची बेचारी प्रजा उससे अकबर ने कोप का भाजन बनाया, यही बात राजा भारमल जानते थे और उन्होंने वहशी अकबर को मूर्ख बनाकर युद्व टाल दिया)।। लाखों मासूमों के सर कटवा दिये , लाखों औरतो को अपने हरम का शिकार बनाया। इस युद्ध के दौरान 8,000 राजपुतानीयाँ जोहर कुण्ड में प्राण त्याग जिन्दा जल गईं ।नोट- अकबर ने राजपूतों के आपसी मन मुटाव का फायदा उठाया क्यो की वह जानता था कि आपसी फूट डालकर ही क्षत्रियो से लड़ा जा सकता है।।

11 .- 1947 की आजादी के बाद पं नेहरू को यह डर था कि जम्म् कश्मीर के महाराजा हरी सिंह ने जिस तरह अपने क्षेत्र पर अपना अधिपथ्य और राज पाठ त्यागने से मना कर दिया था उसी तरह कहीं बाकी की क्षत्रिय रियासतें फिर से अपना रूतबा कायम कर देश पर अपना अधिपथ्य स्थापित ना कर लें इसलिए भारतीय इतिहास में से राजपूताना , मराठा क्षत्रिय ,व अन्य हिन्दू जातीयों के गौरवशाली इतिहास को हटा कर मुगलों का झूठा इतिहास ठूस(भर) दिया ताकी क्षत्रियो का मनोबल हमेशा इस झूठे इतिहास को पढ कर गिरता रहे , लेकिन कुछ बहादुर वीरों के कारनामे छुपाए भी नही छुप सके जैसै राणा प्रताप , छत्रपती शिवाजी,पृथ्वीराज चौहान।हल्दी घाटी युद्घ में अकबर की इतनी बड़ी सेना क्यों नही जीत पाई “प्रताप” से जबकि उस वक्त राणा जी मेवाड़ भी खो चुके थे अत: उनकी आधी सेना मुगलों के चितौड़ आक्रमण में ही समाप्त हो चुकी थी बावजूद इसके नपुंसक व हवसी अकबर क्यों नही जीत पाया 85000 मुगलो को लेकल 10000 राजपूतो से हल्दीघाटी युद्व।। अत: क्यों अकबर ने कभी राणा प्रताप का सामना नही किया !! क्योकी जो राणा का मात्र भाला ही 75 किलो का हो जो राणा रणभूमी में 250 किलो से अधिक वजन के अस्त्र-शस्त्र लेके पूरा दिन रणभूमी में ऐसे लड़ते हो जैसे खेल रहे हो उसका सामना करना मौत का सामना करने के बराबर है और यह बात अकबर को तब पता चली जब राणा प्रताप ने अकबर के तथा सभी इस्लामिक जेहादी सेनापतियों मे सबसे ताकतवर सेनापती व सेना नायक बहलोल खाँ को अपने भाले के प्रथम प्रहार में नाभी से गरदन तक घोडे के धड़ को सीध में फाड़ दिया था ।। इस घटना की खबर सुनकर अकबर इतना डर गया की वह स्वयं कभी राणा प्रताप से नही लड़ा और “”महाराणा प्रताप”” के जीवित रहने तक (12 वर्ष) वह हिन्दुस्तान से बाहर (वर्तमान लाहौर) रहा। अब जरा यह सोचिए की सिर्फ कुछ वीरों ने अकबर की सेना को इस तरह नुकसान पहुचाया तो क्या किसी भी तुर्क मुगलिया, अफगानी या कोई अन्य नपुंसक किन्नर फौज में इतना दम था कि पूरे राजपूताना से लड़ पाते !! ना तो इनमें इतना साहस था ना ही शौर्य इनका साहस तो गंदे राजनितिक कीड़ो ने झूठी किताबों में लिखवाया है !!

12 –नेहरू ने पृथ्वीराज रासो जो कि चंद्रबरदाई (पृथ्वी राज के दरबार में मंत्री) द्वाराकी गई रचनात्मक किताब को राजनितिक तरीके से पहले उसके साक्ष्य़ को नष्ट करवा दिया गया बाद में एतिहासिक दर्जे से हटा कर मात्र पौराणिक कहानी सिद्ध करवा दिया।

नोट – भारतीय इतिहास मे लिखित तौर पर सिर्फ उन वंशों का भारी जिक्र हे जिनके वंश और रियासत पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकीं है मतलब इनके गौरवशाली इतिहास से पंडित नेहरू की सत्ता को कोइ भी क्षति नही पहुचनी थी क्योंकि राजपूत यह वो ताकतवर रियासतें हें जिनका अस्तित्व आज भी जीवित है ।।

13 – मात्र बुंदेला राजपूतों नेअपने साम्राज्य से अकबर के पुत्र एवं उत्तराधिकारी जहांगीर ( कच्छवाहा राजपूतों की परसियन दासी मरियम-उज्-जवानी का पुत्र था ) को अपने राज्य क्षेत्र से खदेढ़ दिया था ।।

14- जहांगीर की माँ व अकबर की बेगम मरियम उज्जवानी अगर राजपूत होती तो अपने पुत्र जहांगीर को बुंदेला राजपूतो से कभी लड़ने ना देती !! और वैसे भी किसी तुर्की का विवाह किसी असली राजपूत से कर दिया जाए तो वह या तो क्रोध से मर जाएगा या फिर अपने रहते उस तुर्क को जिंन्दा नहीं रहने देगा ।।

15 – अब सवाल यह उठता है की आजकल के यह मन घड़ित नाटक(सीरियल) क्यों चलाए जाते है यह इसलिए क्यों की यह इतिहास के किसी भी पन्ने में दर्ज नही है कि मरियम जिसे हम जोधा बोलते हैं वह राजपूत थी दूसरी बात ये की यह एक विवादित मुद्दा है जिसका राजपूत समुदाय कड़ा विरोध करता है इसलिये यह विवादों में आ जाता है और इस झूटे सीरियल को फ्री की प्बलिसिटी मिल जाती है जिसका लाभ प्रोड्यूसर(एकता कपूर जैसो) को मिल जाता है !! और कुछ मासूस हिन्दू लड़कियाँ इस झूठी लव स्टोरी वाले सीरियल को देखकर अकबर के प्रति इम्प्रेस हो जाती है जो की एक कायर और एक अत्याचारी व क्रूर शासक था जिसने लाखों औरतों को अपने हरम का जबरन शिकार बनाया उनकी मजबूरियों का फायदा उठाकर और आजकल की माँर्डन लड़कियाँ बड़े आसानी से लव जिहाद ( इसका मतलब धर्म को बढ़ाना ज्यादा से ज्यादा लोगों को मुसलमान बनाना मार के जबरन या प्यार से भी ) का शिकार बन जातीं है और किसी भी मुसलमान लड़के के झूठे प्यार में फँस जातीं है , बाद में जों होता है उसे में यहाँ लिख नही सकता लेकिन इन सब के पीछे इस्लामिक कट्टरता और धार्मिक राजनीति होती है जिसमें वर्षो से काँग्रेस का हाथ रहा है लेकिन हकीकत तो यही है मित्रों की अकबर एक क्रूर व अत्याचारी शासक था !! जिसने अपना झूठा इतिहास लिखवाया और मरियम(जोधा) जो कि खुद एक दासी होकर भी अकबर की बेगम नहीं बनना नही चाहती थी ।।

16- अकबर की अकबरनामा जिसे कुछ मूर्ख अकबर की आत्मकथा कहते है वह उसकी आत्मकथा नहीं कहला सकती क्योकिआत्म कथा एक मनुष्य खुद लिखता है और अकबर एक अनपढ़ शासक था अकबर नामा के रचनाकार मोहोम्मद अबुल फजल थे जो की अकबर के उत्तीर्ण दर्जे ( उच्च कोटी ) के चाटुकार थे अब अगर वो उसमें ये भी लिख देते की अकबर आसमान के तारे गिनने की क्षमता रखता था तो आप आज परीक्षाओं में इस प्रश्न को भी पढ़ रहे होते ।अब आप ही देखे जो राजा पढा-लिखा न हो वह न तो अध्ययन कर सकताऔर न ही कुछ सोच समझ सकता है वह क्या अपनी प्रजा का भला करेगा वह अपना अधिकतर समय शारीरीक सुखों पर ही खर्च करेगा तो वह काहे का महान।।

17- औरंगजेब को जब अकबर का विवाह दासी की पुत्री से होने वाली बात पता चली तो उसने अकबर के द्वारा हटाए गए जिजया कर(tax for non muslims) और महसूर कर(tax for hindus for doing tirath तीर्थ) को दोबारा चलवाया इसके साथ – साथ उसने इस्लामिक कट्टरवाद को बढ़ावा दिया जो कि मुगलिया सल्तनत के पतन का कारण बनी अंत: राजपूतों , मराठों ने मिलकर मुगलों को खत्म कर डाला और यह थी इतिहास की पहली क्रांती इसके बाद अंग्रेजों का विस्तार हुआ जिन्हें मुगलों ने ही निमंत्रण दिया था ।।

हुकुम क्षत्रियों का इतिहास क्षत्रिय बता सकते है और मुगलों का इतिहास काँन्ग्रेस, वामपंथी।।

जोधा नाम का पात्र शुरू होता है मुगले आजम फिल्म से जिसमें काल्पनिक तौर पर अकबर की बेगम का नाम जोधाबाई रख दिया और इस कथित जोधा बाई को आमेर के राजा भारमल की राजकुमारी बता दिया. फिल्म में जोधाबाई नाम प्रचारित होने के बाद यह इतिहास बन गया और भारत के इतिहास को तोड़ मरोड़ने को लालायित बैठे वामपंथी लेखकों ने अपनी इतिहास पुस्तकों में इसी तथ्य को प्रमुखता से उजागर कर दिया| इस तरह एक मनोरंजन के नाम पर बनी फिल्म ने इतिहास के साथ खिलवाड़ कर दिया |

राजस्थान के स्थानीय इतिहासकारों ने इस बात का पुरजोर खण्डन भी किया कि कथित जोधाबाई आमेर की राजकुमारी नहीं थी. आमेर के राजवंश की वंशावलियों व अन्य दस्तावेजों में कहीं भी जोधाबाई नाम की किसी राजकुमारी का उल्लेख इतिहासकारों को नहीं मिला, बावजूद वामपंथी व छद्म सेकुलर इतिहासकार इस गलत तथ्य को प्रचारित करते रहे| इनके प्रचार को फिल्म व टीवी सीरियल निर्माता कम्पनियों ने भी भूनाने की भरसक कोशिश की| जोधा-अकबर सीरियल के निर्माता बालाजी टेलीफिल्म्स के चेयरमेन अभिनेता जितेन्द्र के साथ वार्ता में जब श्री राजपूत करणी सेना, इतिहासकार टीम तथा सैनिकों के साथ गयी तब इतिहासकारों ने ऐतिहासिक तथ्य रखे तो जितेन्द्र ने यह माना कि जोधाबाई नाम का कोई पात्र था ही नही और नही कोई भी हिन्दु राजकुमारी अकबर के साथ ब्याही गई थी, लेकिन सीरियल में उनका काफी धन लग गया अत: वे पीछे नहीं हट सकते| सीरियल का नाम बदलने की बात पर उनका कहना था कि अकबर के साथ जोधा के बजाय कोई दूसरा नाम जमेगा नहीं क्योंकि यही प्रचारित हो चूका है| इस तरह जानते बुझते धन कमाने के लिए फिल्म, टीवी वाले जोधा नाम छोड़ने को राजी नहीं|
राजस्थान के इतिहासकारों व राजपूत संगठनों ने ऐतिहासिक तथ्य पेश करते हुए कई बार यह साबित करने की कोशिश की कि कथित जोधाबाई किसी विदेशी महिला की संतान थी, लेकिन इस बात को कथित सेकुलर व वामपंथी गैंग ने हवा में उड़ाते हुए खारिज कर दिया| अभी हाल ही में गोवा के एक लेखक कोरिया ने जोधाबाई को लेकर अपनी शोध पुस्तक में बड़ा खुलासा किया है, यह सच जानकर हमें कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि हम शुरू से ही कह रहे है कि अकबर की बीबी व जहाँगीर की माँ राजपूत नहीं विदेशी लड़की थी|

गोवा के लेखक लुईस डी असीस कॉरिया ने अपनी किताब ‘पुर्तगीज इंडिया एंड मुगल रिलेशंस 1510-1735’ में कहा है कि जोधाबाई वास्तव में एक पुर्तगाली महिला थीं, जिनका नाम डोना मारिया मैस्करेनहास था, जो पुर्तगाली जहाज से अरब सागर होते हुए आईं थी।

आज इस्लामियै तथा दलालों से ज्यादा हिन्दु ही ऐतिहासिक अध्ययन के अभाव मे उके द्वारा बनाई हुई मनगढंत कहानियों को जोर देते है। अतः आपसे अनुरोध है कि ज्यादा से ज्यादा लोगो को जागरूक करे।इस सम्बन्ध मे गोवा के एक बहुत ही पहुँचे हुये इतिहासकार Luis de Assis Correia द्वारा लिखित पुस्तक जो कि सम्पूर्ण साक्ष्यों द्वारा प्रमाणित है – PORTUGUESE INDIA AND MUGHAL RELATIONS (1510-1735)

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Create a website or blog at WordPress.com

Up ↑

Create your website at WordPress.com
Get started
%d bloggers like this: